अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित सुरम्य वातावरण में हरीतिमा से युक्त महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक अध्ययन एवं योग शिक्षा की मशाल को अविरल रखने के लिए प्रतिबद्ध हैंl विश्वविद्यालय परिसर में 24 सितंबर, 1998 में तात्कालीन कुलपति, शैक्षणिक प्रणेता व भारतीय ज्ञान परंपरा के दूरदर्शी विचारक प्रो. पुरुषोत्तम लाल चतुर्वेदी के सानिध्य में यहां वेद, योग एवं भारतीय ज्ञान परंपरा की त्रिवेणी का शुभारंभ हुआ थाl यहां विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से पोषित भवन जिसका नाम पतंजलि भवन दिया गया में यह पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैंl आधुनिक भारत के समाज सुधारक, स्त्री शिक्षा, स्वदेशी राष्ट्रभाषा व गुरुकुल पद्धति के जनक महर्षि दयानंद सरस्वती की उक्ति " *वेदोऽखिलो धर्ममूलम्* ।" अर्थात सम्पूर्ण वेद ही धर्म का मूल हैं को शतांश सार्थक कर रहे हैं ये पाठ्यक्रम l यहां वैदिक वांग्मय पाठ्यक्रम 2005 -06 प्रारंभ किया गया था ,इसके साथ ही योग शिक्षा में एक वर्षीय डिप्लोमा एवं 6 माह का प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम तथा वैदिक वांग्मय दो वर्षीय पाठ्यक्रम स्ववित्त पोषित योजना पर संचालित हैl विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से 1998 -99 से इस हेतु
कई वर्षों तक अनुदान प्राप्त होता रहा है lयहां संस्कृत साहित्य में व्याकरण, नाटक ,दर्शन आदि विषय पर विद्यार्थियों को अध्ययन का अवसर प्राप्त होता है वही संस्कृत वांग्मय के अंतर्गत चारों वेद,वैदिक साहित्य ,वैदिक दर्शन तथा उपनिषद दर्शन आदि क्षेत्रों में भी विशेषज्ञता का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है, जो जिज्ञासु विद्यार्थी वेदों को गहराई से जानने समझने तथा इसमें विशेष विशिष्ट उपलब्धि की मंशा रखते हैं, उन्हें विश्वविद्यालय वैदिक वांग्मय में स्नातकोत्तर उपाधि करने सुलभ अवसर प्रदान करता हैl
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| S.No. | Name | Father's Name | Course Name | Year | Current Employer | Current Post |
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